पादप रोग कौन फैलाते हैं

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पादप रोग कौन फैलाते हैं

जड़ का रूपांतरण :-
वे जड़ जो भोजन को संग्रहित करने पर फूल जाती हैं |मूसला जड़ – गाजर और शलजम की , अपस्थानिक जड़ – शकरकंद की |
अवस्त्म्भ जड़ – अवस्त्म्भ जड़ तने के निचली गांठो से निकलती हैं , जो मक्का तथा तने को सहारा देती हैं |
श्वसन जड़ – श्वसन जड़ श्वसन के लिए ऑक्सीजन प्राप्त करने में सहायता प्रदान करती हैं |

तना ( Stem ) :-
व्रक्ष के ऊपरी भाग को तना कहते हैं | शाखाएँ , पत्तीयाँ , फूल तथा फल व्रक्ष के तने पर स्थित होते हैं | अंकुरित बीज के भ्रूण के प्रांकुर से तना विकसित होता हैं | तने में जहां से पत्तियाँ निकलती हैं , use गाँठ कहते हैं | तने का रंग प्रायः हरा होता हैं | और बाद में वह काष्ठीय तथा गहरा भूरा दिखाई देता हैं |

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तने के कार्य :-
तने का कार्य पत्ती , फूल तथा फल को संभाले रखना तथा शाखाओं को फैलाना हैं |
तना पानी , खनिज लवण और प्रकाश संश्लेषी पदार्थों का संवहन करने में मद्त करता हैं |
तना भोजन संग्रह करने , कायिक प्रवर्धन करने में सहायता प्रदान करते हैं |
जब परिस्थितियाँ अनुकूल ना हो तब तना व्रद्धि के लिए चिर कालिक अंग का कार्य करते हैं |
तने का रूपान्त्रण
तना विभिन्न कार्यो को सम्पन्न करने के लिए खुद को रूपांतरित कर लेता हैं |
भूमिगत तने भोजन संचय करने के लिए रूपांतरित हो जाते हैं , जैसे – आलू , अदरक, हल्दी, जमीकन्द और अरबी के तने |
पशुओं से पौधे को बचाने के लिए बहुत से पौधों में काँटे होते हैं , जैसे – सिट्रस , बोगेनविया |
तने के प्रतान पतले और कुंडलित होते हैं , जो कक्षीय कली से निकलते हैं |

पत्ती ( Leaf ) :-
पत्तियों की संरचना सामान्यतः पाश्र्वीय तथा चपटी होती हैं | पत्ती तने पर लगी होती हैं | पत्ती के कक्ष में कली होती हैं |
शाखा में विकसित हो जाती हैं , उसे कक्षीय कली कहते हैं |
प्ररोह के शीर्षस्थ विभज्योतक ( Meristeme ) भाग से पत्तियाँ निकलती हैं | पत्तियाँ पौधों की कायिक अंग हैं , जो भोजन का निर्माण करती हैं |

प्ररूपी पत्ती के भाग –
पर्णाधार –
पर्णाधार की सहायता से पत्तियाँ तने से जुड़ी होती हैं |
पर्णवृन्ततल्प ( पल्वाइनस )-
एक बीजपत्री में पर्णाधार , फ़ैल जाता हैं , जिससे तने को आंशिक व पूर्ण ढक लेता हैं , पर्णाधार कुछ लेग्यूमी तथा कुछ अन्य पौधों में फूल जाता हैं | जिसे पर्णवृन्ततल्प कहते हैं |
पर्णवृन्त-
पर्णवृन्त पत्ती की सजावट इस तरह से करता हैं , इसे अधिकतम सूर्य की प्राप्ती हो सके | ताजी हवा पत्ती को मिल सके | इसके लिए पर्णवृन्त स्तरिका को हिलाता हैं | स्तरिका पत्ती का फैला हुआ भाग होती हैं | स्तरिका के बीच में एक स्पष्ट शिरा होती हैं , जिसे मध्य शिरा कहते हैं |
पत्ती के प्रकार-
1) सरल पत्ती
2) संयुक्त पत्ती
3) पर्णविन्यास
पर्णविन्यास में तने व शाखा पर पत्ती विन्यस्त क्रम में रहती हैं |

पर्णविन्यास तीन प्रकार का होता हैं :-
1) एकांतर
2) सम्मुख
3) चक्करदार

पत्ती का रूपांतरण –
भोजन बनाने के अतिरिक्त पत्ती को अन्य कार्यों के लिए रूपांतरित होना पड़ता हैं |प्रतान में जैसे – मटर ऊपर चढ़ने के लिए , शूल ( कांटों ) रक्षा के लिए जैसे – कैक्टस में परिवर्तित हो जाते हैं |
भोजन का संचय प्याज तथा लहसुन की गूदेदार पत्तियों में होता हैं |
कुछ पौधों में पत्तियाँ छोटी तथा अल्पआयु होती हैं जैसे – ऑस्ट्रेलियन अकेसिया , इनका पर्णवृन्त फैल कर हरा हो जाता हैं और भोजन बनाने का कार्य करता |
पत्ती घड़े के आकार में रूपांतरित हो जाती हैं | कुछ कीटाहारी पादपों में जैसे – घटपर्णी , वीनस फ्लाई ट्रेप |

जीवविज्ञान तथ्यसमुच्चय :-
कौन सा जानवर ज्यादातर बांस खाता है – लाल पांडा
गन्ने की लाल सड़न के लिए कौन जिम्मेदार है? Colletotrichum falcatum
कौन सा कवक मूंगफली का टिक्का रोग के लिए जिम्मेदार है? – Cercospora personata
मालिश और व्यायाम के माध्यम से शरीर के दोषों का इलाज क्या है? – फिजियोथेरेपी
भ्रूण के विकास और विकास के अध्ययन क्या है? – भ्रूणविज्ञान
नाड़ी और धमनी रक्तचाप का अध्ययन को क्या कहा जाता है? – Sphygmology
पौधे और पशु पर जहरीले रासायनिक पदार्थ के प्रभाव के अध्ययन को क्या कहा जाता है – विष विज्ञान
विज्ञान की शाखा है जो मनुष्य की त्वचा के अध्ययन से संबंधित है – त्वचा विज्ञान
प्रोटीन का स्रोत जो आसानी से पच जाता है – सोयाबीन
कितना प्रतिशत पानी मानव के रक्त प्लाज्मा में पाया जाता है – 91 से 92%
कौन सा एंजाइम दूध को पचाने में सहायक होता है – rennin
मस्तिष्क का कौन सा हिस्सा प्यास भूख और नींद का केंद्र है? – Hypothalmus
कौनसी रोगाणुरोधी दवा टीबी और कुष्ठ रोग के इलाज के लिए उपयुक्त है? – रिफैम्पिसिन
डीएनए के कृत्रिम संश्लेषण के लिए किसको नोबेल प्राइज मिला था – Kornberg
पारिस्थितिकी तंत्र के अजैव घटक क्या है? – पानी
कौन सा ऊर्जा का स्रोत प्रदूषण की समस्या नहीं है – सूर्य
अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन परत में छिद्र की खोज कब हुई – 1985
कौन सा पहला राष्ट्रीय उद्यान भारत में स्थापित किया गया – कॉर्बेट
कौन सा संगठन रेड डाटा बुक को बनाए रखने के लिए कौन जिम्मेदार है? – IUCN
कौन से वैज्ञानिक ने ‘जाति Annelida’ की स्थापना की है? – Lamark
एडवर्ड जेनर किस रोग से संबंधित है – चेचक
कौन सा हानिकारक तत्व तम्बाकू में मौजूद है – निकोटीन
जीवन की उत्पत्ति का सिद्धांत किसने प्रस्तावित किया गया था – Oparin
दिल की कितनी जोड़ी एक केंचुआ में पाया जाता है – चार
1942 में बंगाल अकाल का कारण क्या था – चावल की पत्ती में धब्बे

चरमपसंदी :-
स्पेन की रिओ तिन्तो (नदी) जिसके तेज़ाब-युक्त पानी को उसमें रह रहे चरमपसंदी जीवाणु एक पीला-नारंगी सा रंग दे देते हैं चरमपसंदी ऐसे जीव को कहा जाता है, जो ऐसे चरम वातावरण में फलता-फूलता हो जहाँ पृथ्वी पर रहने वाले साधारण जीव बहुत कठिनाई से जीवित रह पाते हो या बिलकुल ही रह न सके। ऐसे चरम वातावरणों में ज्वालामुखी चश्मों का खौलता-उबलता हुऐ पानी, तेज़ाब से भरपूर वातावरण और आरसॅनिक जैसे ज़हरीले पदार्थों से युक्त वातावरण शामिल हैं। .

चर्म रोग :-
एक चर्मरोग त्वचा के किसी भाग के असामान्य अवस्था को चर्मरोग (dermatosis) कहते हैं। त्वचा शरीर का सनसे बड़ा तंत्र है। यह सीधे बाहरी वातावरण के सम्पर्क में होता है। इसके अतिरिक्त बहुत से अन्य तन्त्रों या अंगों के रोग (जैसे बाबासीर) भी त्वचा के माध्यम से ही अभिव्यक्त होते हैं। (या अपने लक्षण दिखाते हैं) त्वचा शरीर का सबसे विस्तृत अंग है साथ ही यह वह अंग है जो बाह्य जगत् के संपर्क (contact) में रहता है। यही कारण है कि इसे अनेक वस्तुओं से हानि पहुँचती है। इस हानि का प्रभाव शरीर के अंतरिक अवयवों पर नहीं पड़ता। त्वचा के रोग विभिन्न प्रकार के होते हैं। त्वचा सरलता से देखी जा सकती है। इस कारण इसके रोग, चाहे चोट से हों अथवा संक्रमण (infection) से हों, रोगी का ध्यान अपनी ओर तुरंत आकर्षित कर लेते हैं। sunil.

ऊष्मपसंदी :-
ऊष्मपसंदी (Thermophile, थर्मोफ़ाइल) ऐसे चरमपसंदी जीव होते हैं जो 41° से 122° सेंटीग्रेड के ऊँचे तापमान में पनपते हैं और प्रजनन कर सकते हैं। कई ऊष्मपसंदी आर्किया होते हैं और जीववैज्ञानिक समझते हैं कि पृथ्वीपर उत्पन्न होने वाले सबसे पहले बैक्टीरिया भी ऊष्मपसंदी थे। .

टी-कोशिका :-
टी-कोशिका एक प्रमुख लसीकाणु(लिम्फ़ोसाइट) है। लसीकाणु या लसीकाकोशिका एक प्रकार की श्वेत रक्त कोशिका कोशिका हैं। टी-कोशिका अपने निर्माण के बाद बाल्यग्रन्थि या थाइमस ग्रन्थि में चली जाती है, वहीं पर इसका विकास होता है। इसलिए इसके नाम से टी अक्षर जुड़ा है। यह कोशिका विभिन्न रोगाणुओं से शरीर की सुरक्षा करती है। जब कोई रोगाणु, जैसे कि जीवाणु, विषाणु इत्यादि शरीर में प्रवेश करते है, तो यह एक प्रकार के रसायन प्रतिपिण्ड का निर्माण करती है। यह प्रतिपिण्ड उस विशेस रोगाणु का मुकाबला कर के उसे नष्ट कर देता है। श्रेणी:जीव विज्ञान श्रेणी:कोशिकाविज्ञान.

टीका (वैक्सीन) :-
Edward Jenner was the person who developed first vaccine टीका (vaccine) एक जीवों के शरीर का उपयोग करके बनाया गया द्रब्य है जिसके प्रयोग से शरीर की किसी रोग विशेष से लड़ने की क्षमता बढ़ जाती है। .

टीकाकरण :-
मुँह से पोलियो का टीका ग्रहण करता हुआ एक बच्चा किसी बीमारी के विरुद्ध प्रतिरोधात्मक क्षमता (immunity) विकसित करने के लिये जो दवा खिलायी/पिलायी या किसी अन्य रूप में दी जाती है उसे टीका (vaccine) कहते हैं तथा यह क्रिया टीकाकरण (Vaccination) कहलाती है। संक्रामक रोगों की रोकथाम के लिये टीकाकरण सर्वाधिक प्रभावी एवं सबसे सस्ती विधि माना जाता है। टीके, एन्टिजनी (antigenic) पदार्थ होते हैं। टीके के रूप में दी जाने वाली दवा या तो रोगकारक जीवाणु या विषाणु की जीवित किन्तु क्षीण मात्रा होती है या फिर इनको मारकर या अप्रभावी करके या फिर कोई शुद्ध किया गया पदार्थ, जैसे – प्रोटीन आदि हो सकता है। सनसे पहले चेचक का टीका आजमाया गया जो कि भारत या चीन २०० इसा पूर्व हुआ। .

एनोरेक्सिया नर्वोज़ा :-
क्षुधा अभाव (एनोरेक्सिया नर्वोज़ा) (AN) एक प्रकार का आहार-संबंधी विकार है जिसके लक्षण हैं – स्वस्थ शारीरिक वजन बनाए रखने से इंकार और स्थूलकाय हो जाने का डर जो विभिन्न बोधसंबंधी पूर्वाग्रहों पर आधारित विकृत स्व-छवि के कारण उत्पन्न होता है। ये पूर्वाग्रह व्यक्ति की अपने शरीर, भोजन और खाने की आदतों के बारे में चिंतन-मनन की क्षमता को बदल देते हैं। AN एक गंभीर मानसिक रोग है जिसमें अस्वस्थता व मृत्युदरें अन्य किसी मानसिक रोग जितनी ही होती हैं। यद्यपि यह मान्यता है कि AN केवल युवा श्वेत महिलाओं में ही होता है तथापि यह सभी आयु, नस्ल, सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के पुरूषों और महिलाओं को प्रभावित कर सकता है। एनोरेक्सिया नर्वोज़ा पद का प्रयोग महारानी विक्टोरिया के निजी चिकित्सकों में से एक, सर विलियम गल द्वारा 1873 में किया गया था। इस शब्द की उत्पत्ति ग्रीक से हुई है: a (α, निषेध का उपसर्ग), n (ν, दो स्वर वर्णों के बीच की कड़ी) और orexis (ओरेक्सिस) (ορεξις, भूख), इस तरह इसका अर्थ है – भोजन करने की इच्छा का अभाव |

एंथ्राक्स :-
ऐन्थ्रैक्स का जीवाणु एन्थ्राक्स एक खतरनाक एवं जानलेवा रोग है। यह मानव एवं पशु दोंनो को संक्रमित करता है। इसका कारण बेसिलस ऐन्थ्रैक्स नामक जीवाणु है। इस रोग के खिलाफ कार्य करने वाला वैक्सीन हैं एवं प्रतिजैविक भी उपलब्ध हैं। बींसवा सदी को आने तक इस रोग ने एशिया, यूरोप और उत्तरी अमेरिका में लाखों पशुओं एवं मनुष्यों को प्रतिवर्ष मारा। सर्वप्रथम फ्रांसीसी वैज्ञानिक लुई पाश्चर ने इसके पहले प्रभावी वैक्सीन का निर्माण किया। यह बैक्टिरिया संक्रामक नहीं है और मुख्य रूप से जानवरों में फैलता है, फिर भी खाने–पीने से ले कर सांस के साथ इसके स्पॊर हमारे शरीर में पहुँच कर अंकुरित हो सकते हैं। यहाँ तक कि हमारी त्वचा में भी यदि कोई घाव है तो वहाँ भी ये अंकुरित हो सकते हैं और कुछ ही समय में इस बीमारी के जानलेवा लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं। खाने–पीने के साथ एंथ्रैक्स के स्पॊर्स हमारे आहार नाल मे पहुँच कर मितली, खूनी उल्टी, खूनी दस्त, पेट दर्द आदि के लक्षण उत्पन्न करते हैं। २५ से ६० प्रतिशत लोगों की मृत्यु भी हो जाती है। त्वचा पर इसका प्रभाव छोटे–छोटे उभारों के रूप में दीखता है जो शीघ्र ही फोड़े का रूप ले लेता है जिससे पानी के समान पतला पीव बहता रहता है। प्रारंभिक लक्षणों के समय इसका निदान सिप्रोफ्लॉक्सेसिन नामक एंटीबॉयोटिक द्वारा किया जा सकता है परंतु बाद में केवल इस बैक्टिरिया को नष्ट किया जा सकता है, इस बीमारी के लक्षणों को नहीं। .

एकल कोशी प्रोटीन :-
एकल कोशी प्रोटीन शैवाल या ऐल्गी, फफूंद या कवक, खामीर या यीस्ट एवं जीवाणु एकल कोशी सूक्ष्म जीव हैं, जिनमें प्राप्य प्रोटीन का उपयोग मानव आहार तथा पशु-आहार के रूप में किया जा सकता है; परंतु इन जीवों का अविषैला होना आवश्यक है। इन्हें प्रचलित रूप में एस सी पी या सिंगल सेल प्रोटीन कहा जाता है। श्रेणी:जीव विज्ञान श्रेणी:शब्दावली श्रेणी:सूक्ष्मजैविकी श्रेणी:जैव प्रौद्योगिकी श्रेणी:आण्विक जैविकी |

डिप्थीरिया :-
रोहिणी या डिप्थीरिया (Diphtheria) उग्र संक्रामक रोग है, जो 2 से लेकर 10 वर्ष तक की आयु के बालकों को अधिक होता है, यद्यपि सभी आयुवालों को यह रोग हो सकता है। इसका उद्भव काल (incubation period) दो से लेकर चार दिन तक का है। रोग प्राय: गले में होता है और टॉन्सिल भी आक्रांत होते हैं। स्वरयंत्र, नासिका, नेत्र तथा बाह्य जननेंद्रिय भी आक्रांत हो सकती हैं। यह वास्तव में स्थानिक रोग है, किंतु जीवाणु द्वारा उत्पन्न हुए जीवविष के शरीर में व्याप्त होने से रुधिर विषाक्तता (Toxemia) के लक्षण प्रकट हो जाते हैं। ज्वर, अरुचि, सिर तथा शरीर में पीड़ा आदि जीवविष के ही परिणाम होते हैं। इनका विशेष हानिकारक प्रभाव हृदय पर पड़ता है। कुछ रोगियों में इनके कारण हृदयविराम (heart failure) से मृत्यु हो जाती है।

तरण ताल :-
बैकयार्ड तरण ताल नेवादा, लास वेगास, संयुक्त राज्य अमेरिका में छत के ऊपर बने एक तरण ताल का ऊपर से दृश्य तरण ताल, या स्वीमिंग पूल, तैराकी या जल-आधारित मनोरंजन के इरादे से पानी से भरे एक स्थान को कहते हैं। इसके कई मानक आकार हैं; ओलंपिक-आकार का स्विमिंग पूल सबसे बड़ा और सबसे गहरा होता है। पूल को जमीन से ऊपर या जमीन पर धातु, प्लास्टिक, फाइबरग्लास या कंक्रीट जैसी सामग्रियों से बनाया जा सकता है। जिस पूल को कई लोगों द्वारा या आम जनता के द्वारा उपयोग किया जा सकता है उसे पब्लिक पूल कहते हैं, जबकि विशेष रूप से कुछ लोगों द्वारा या किसी घर में इस्तेमाल किये जाने वाले पूल को प्राइवेट पूल कहा जाता है। कई हेल्थ क्लबों, स्वास्थ्य केन्द्रों और निजी क्लबों में सार्वजनिक पूल होते हैं जिन्हें ज्यादातर व्यायाम के लिए इस्तेमाल किया जाता है। कई होटलों और मसाज पार्लरों में तनाव से मुक्ति के लिए सार्वजनिक पूल मौजूद होते हैं। हॉट टब और स्पा ऐसे पूल होते हैं जिसमें गर्म पानी होता है जिसे तनाव मुक्ति या चिकित्सा के लिए इस्तेमाल किया जाता है और ये घरों, क्लबों एवं मसाज पार्लरों में आम तौर पर मौजूद होते हैं। स्विमिंग पूल (तरण ताल) का उपयोग ग़ोताख़ोरी (डाइविंग) और पानी के अन्य खेलों के साथ-साथ लाइफगार्ड्स और अंतरिक्ष यात्रियों के प्रशिक्षण में भी होता है। स्विमिंग पूलों में बैक्टीरिया, वायरस, शैवाल और कीट लार्वा के विकास और प्रसार को रोकने के लिए अक्सर रासायनिक कीटाणुनाशकों जैसे कि क्लोरीन, ब्रोमिन या खनिज सैनिटाइजर्स और अतिरिक्त फिल्टरों का उपयोग किया जाता है। वैकल्पिक रूप से पूल कीटाणुनाशकों के बगैर अतिरिक्त कार्बन फिल्टरों और यूवी कीटाणुशोधन के साथ बायोफ़िल्टर का इस्तेमाल कर तैयार किये जा सकते हैं। दोनों ही मामलों में तालों (पूल) में एक उचित प्रवाह दर को बनाये रखना आवश्यकता होता है। .

तानिकाशोथ :-
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र की तानिकाएं (Meninges): ”’दृढ़तानिका”’ या ड्यूरा मैटर (dura mater), ”’जालतानिका”’ या अराकनॉयड (arachnoid), तथा ”’मृदुतानिका”’ या पिया मैटर (pia mater) तानिकाशोथ या मस्तिष्कावरणशोथ या मेनिन्जाइटिस (Meningitis) मस्तिष्क तथा मेरुरज्जु को ढंकने वाली सुरक्षात्मक झिल्लियों (मस्तिष्कावरण) में होने वाली सूजन होती है। यह सूजन वायरस, बैक्टीरिया तथा अन्य सूक्ष्मजीवों से संक्रमण के कारण हो सकती है साथ ही कम सामान्य मामलों में कुछ दवाइयों के द्वारा भी हो सकती है। इस सूजन के मस्तिष्क तथा मेरुरज्जु के समीप होने के कारण मेनिन्जाइटिस जानलेवा हो सकती है; तथा इसीलिये इस स्थिति को चिकित्सकीय आपात-स्थिति के रूप में वर्गीकृत किया गया है। मेनिन्जाइटिस के सबसे आम लक्षण सर दर्द तथा गर्दन की जकड़न के साथ-साथ बुखार, भ्रम अथवा परिवर्तित चेतना, उल्टी, प्रकाश को सहन करने में असमर्थता (फ़ोटोफोबिया) अथवा ऊंची ध्वनि को सहन करने में असमर्थता (फ़ोनोफोबिया) हैं। बच्चे अक्सर सिर्फ गैर विशिष्ट लक्षण जैसे, चिड़चिड़ापन और उनींदापन प्रदर्शित करते हैं। यदि कोई ददोरा भी दिख रहा है, तो यह मेनिन्जाइटिस के विशेष कारण की ओर संकेत हो सकता है; उदाहरण के लिये, मेनिन्गोकॉकल बैक्टीरिया के कारण होने वाले मेनिन्जाइटिस में विशिष्ट ददोरे हो सकते हैं। मेनिन्जाइटिस के निदान अथवा पहचान के लिये लंबर पंक्चर की आवश्यकता हो सकती है। स्पाइनल कैनाल में सुई डाल कर सेरिब्रोस्पाइनल द्रव (CSF) का एक नमूना निकाला जाता है जो मस्तिष्क तथा मेरुरज्जु को आवरण किये रहता है। सीएसएफ़ का परीक्षण एक चिकित्सा प्रयोगशाला में किया जाता है। तीव्र मैनिन्जाइटिस के प्रथम उपचार में तत्परता के साथ दी गयी एंटीबायोटिक तथा कुछ मामलों में एंटीवायरल दवा शामिल होती हैं। अत्यधिक सूजन से होने वाली जटिलताओं से बचने के लिये कॉर्टिकोस्टेरॉयड का प्रयोग भी किया जा सकता है। मेनिन्जाइटिस के गंभीर दीर्घकालिक परिणाम हो सकते हैं जैसे बहरापन, मिर्गी, हाइड्रोसेफॉलस तथा संज्ञानात्मक हानि, विशेष रूप से तब यदि इसका त्वरित उपचार न किया जाये। मेनिन्जाइटिस के कुछ रूपों से (जैसे कि मेनिन्जोकॉकी, ”हिमोफिलस इन्फ्लुएंजा” टाइप बी, न्यूमोकोकी अथवा मम्स वायरस संक्रमणों से संबंधित) प्रतिरक्षण के द्वारा बचाव किया जा सकता है। .

थैलोफाइटा :-
थैलोफाइटा (Thallophyta) पहले पादप जगत के एक प्रभाग (division) के रूप में मान्य था किन्तु अब वह वर्गीकरण निष्प्रभावी हो गया है। थैलोफाइटा के अन्तर्गत कवक, शैवाल और लाइकेन आते थे। कभी-कभी जीवाणु (बैक्टीरिया) और मिक्सोमाइकोटा (Myxomycota) को भी इसमें शामिल कर लिया जाता था। इनके जनन तंत्र अस्पष्ट होते हैं। इसलिये इन्हें क्रिप्टोगैम (cryptogamae) भी कहते हैं। अब ‘थैलोफाइटा’ को शैवाल, बैक्टीरिया, कवक, लाइकेन आदि असंगत जीवों का समूह माना जाता है। इस समूह में वे पादप आते हैं जिनका शरीर सुपरिभाषित (well-differentiated) नहीं होता।

दही :-
तुर्की की दही. दही एक दुग्ध-उत्पाद है जिसका निर्माण दूध के जीवाणुज किण्वन द्वारा होता है। लैक्टोज का किण्वन लैक्टिक अम्ल बनाता है, जो दूध प्रोटीन से प्रतिक्रिया कर इसे दही मे बदल देता है साथ ही इसे इसकी खास बनावट और विशेष खट्टा स्वाद भी प्रदान करता है। सोया दही, दही का एक गैर दुग्ध-उत्पाद विकल्प है जिसे सोया दूध से बनाया जाता है। खाने में दही का प्रयोग पिछले लगभग 4500 साल से किया जा रहा है। आज इसका सेवन दुनिया भर में किया जाता है। यह एक स्वास्थ्यप्रद पोषक आहार है। यह प्रोटीन, कैल्शियम, राइबोफ्लेविन, विटामिन B6 और विटामिन B12 जैसे पोषक तत्वों से समृद्ध होता है। .

दही (योगहर्ट या योगर्ट) :-
तुर्की दही एक तुर्की ठंडा भूख बढ़ाने वाला दही का किस्म दही (Yoghurt) एक दुग्ध-उत्पाद है जिसे दूध के जीवाण्विक किण्वन के द्वारा बनाया जाता है। लैक्टोज के किण्वन से लैक्टिक अम्ल बनता है, जो दूध के प्रोटीन पर कार्य करके इसे दही की बनावट और दही की लाक्षणिक खटास देता है। सोय दही, दही का एक गैर-डेयरी विकल्प है जिसे सोय दूध से बनाया जाता है। लोग कम से कम 4,500 साल से दही-बना रहे हैं-और खा रहे हैं। आज यह दुनिया भर में भोजन का एक आम घटक है। यह एक पोषक खाद्य है जो स्वास्थ्य के लिए अद्वितीय रूप से लाभकारी है। यह पोषण की दृष्टि से प्रोटीन, कैल्सियम, राइबोफ्लेविन, विटामिन B6 और विटामिन B12 में समृद्ध है। .

धनुस्तम्भ :-
धनुस्तंभ (अंग्रेज़ी Tetanus / टिटेनस) एक संक्रामक रोग है, जिसमें कंकालपेशियों को नियंत्रित करने वाली तंत्रिका-कोशिकाएँ प्रभावित होतीं हैं। कंकालपेशियों के तंतुओं (फाइबर) के लम्बे समय तक खिंचे रह जाने से यह अवस्था प्रकट होती है। यह रोग मिट्टी में रहनेवाले बैक्टीरिया से घावों के प्रदूषित होने के कारण होती है। इस बैक्टीरिया को बैक्टीरियम क्लोस्ट्रीडियम कहा जाता है। यह मिट्टी में लंबी अवधि तक छेद बना कर दीमक के समान रह सकता है। जब कोई घाव इस छेदनुमा घर में रहनेवाले दीमक रूपी बैक्टीरिया से प्रदूषित होता है, तो टेटनस बीमारी पैदा होती है। जब ये बैक्टीरिया सक्रिय होकर तेजी से बढ़ने लगते हैं और मांसपेशियों को प्रभावित करनेवाला जहर पैदा करने लगते हैं, तो टेटनस का संक्रमण फैलता है। टेटनस बैक्टीरिया पूरे वातावरण में, आमतौर पर मिट्टी, धूल और जानवरों के मल में पाया जाता है। हमारे शरीर में बैक्टीरिया के प्रवेश के रास्ता आमतौर पर फटे हुए घाव होता है, जो जंग लगी कीलों, धातु के टुकड़ों या कीड़ों के काटने, जलने या त्वचा के फटने से बनता है। .

धान :-
बांग्लादेश में धान (चावल) के खेत धान की बाली (अनाज वाला भाग) धान (Paddy / ओराय्ज़ा सैटिवा) एक प्रमुख फसल है जिससे चावल निकाला जाता है। यह भारत सहित एशिया एवं विश्व के बहुत से देशों का मुख्य भोजन है। विश्व में मक्का के बाद धान ही सबसे अधिक उत्पन्न होने वाला अनाज है। ओराय्ज़ा सैटिवा (जिसका प्रचलित नाम ‘एशियाई धान’ है) एक पादप की जाति है। इसका सबसे छोटा जीनोम होता है (मात्र ४३० एम.बी.) जो केवल १२ क्रोमोज़ोम में सीमित होता है। इसे सरलता से जेनेटिकली अंतरण करने लायक होने की क्षमता हेतु जाना जाता है। यह अनाज जीव-विज्ञान में एक मॉडल जीव माना जाता है।

नाइट्रोजन :-
नाइट्रोजन (Nitrogen), भूयाति या नत्रजन एक रासायनिक तत्व है जिसका प्रतीक N है। इसका परमाणु क्रमांक 7 है। सामान्य ताप और दाब पर यह गैस है तथा पृथ्वी के वायुमण्डल का लगभग 78% नाइट्रोजन ही है। यह सर्वाधिक मात्रा में तत्व के रूप में उपलब्ब्ध पदार्थ भी है। यह एक रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन और प्रायः अक्रिय गैस है। इसकी खोज 1772 में स्कॉटलैण्ड के वैज्ञनिक डेनियल रदरफोर्ड ने की थी। आवर्त सारणी के १५ वें समूह का प्रथम तत्व है। नाइट्रोजन का रसायन अत्यंत मनोरंजक विषय है, क्योंकि समस्त जैव पदार्थों में इस तत्व का आवश्यक स्थान है। इसके दो स्थायी समस्थानिक, द्रव्यमान संख्या 14, 15 ज्ञात हैं तथा तीन अस्थायी समस्थानिक (द्रव्यमान संख्या 13, 16, 17) भी बनाए गए हैं। नाइट्रोजन तत्व की पहचान सर्वप्रथम 1772 ई. में रदरफोर्ड और शेले ने स्वतंत्र रूप से की। शेले ने उसी वर्ष यह स्थापित किया कि वायु में मुख्यत: दो गैसें उपस्थित हैं, जिसमें एक सक्रिय तथा दूसरी निष्क्रिय है। तभी प्रसिद्ध फ्रांसीसी वैज्ञानिक लाव्वाज़्ये ने नाइट्रोजन गैस को ऑक्सीजन (सक्रिय अंश) से अलग कर इसका नाम ‘ऐजोट’ रखा। 1790 में शाप्टाल (Chaptal) ने इसे नाइट्रोजन नाम दिया।

नाइट्रीकरण :-
नाइट्रोजन चक्र नाइट्रीकरण जैव रासायनिक क्रिया है, इसमें अमोनिया के आक्सीकरण से नाइट्राइट एवं नाइट्रेट बनते हैं। यह नाइट्रोजन चक्र की एक महत्वपूर्ण अवस्था है। सर्वप्रथम नाइट्राइट जीवाणु नाइट्रोसोमोनास एवं नाइट्रोकॉकस अमोनिया का ऑक्सीकरण नाइट्राइट (NO2) में करते हैं। उसके पश्चात नाइट्रेट जीवाणु-नाइट्रोबैक्टर नाइट्राइट का परिवर्तन नाइट्रेट में करते हैं। यह नाइट्रेट फिर पादपों द्वारा भूमि से जड़ों द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है और इस प्रकार नाइट्रोजन आहार शृंखला में प्रवेश करता है। नाइट्रीकरण की क्रिया दो समूह के जीवों द्वारा होती है, अमोनिया का आक्सीकरण करने वाले जीवाणु तथा अमोनिया का आक्सीकरण करने वाले आर्किया |

न्यूट्रोपेनिया :-
न्यूट्रोपेनिया, लैटिन के उपसर्ग नयूट्रो -(कोई भी नहीं, निष्पक्ष अभिरंजन के लिए) और ग्रीक प्रत्यय -πενία (कमी), एक रुधिर संबंधित विकार है जिसके तहत रक्त में सबसे महत्वपूर्ण श्वेत रक्त कोशिका ‘न्यूट्रोफिल’ की असामान्य रूप से कमी हो जाती है। नयूट्रोफिल आमतौर पर संचारित श्वेत रक्त कोशिकाओं का 50-70% हिस्सा बनाते हैं और रुधिर में उपस्थित बैक्टीरिया को नष्ट करके संक्रमण के खिलाफ शरीर के प्राथमिक रोग प्रतिरोधक के रूप में काम करते हैं। इसलिए, न्यूट्रोपेनिया के रोगियों को बैक्टीरियल संक्रमणों की ज्यादा आशंका रहती है और यदि शीघ्र चिकित्सकीय सुविधा न मिले तो यह रोग जानलेवा हो सकता है |

न्यूमोनिया :-
फुफ्फुसशोथ या फुफ्फुस प्रदाह (निमोनिया) फेफड़े में सूजन वाली एक परिस्थिति है—जो प्राथमिक रूप से अल्वियोली(कूपिका) कहे जाने वाले बेहद सूक्ष्म (माइक्रोस्कोपिक) वायु कूपों को प्रभावित करती है। यह मुख्य रूप से विषाणु या जीवाणु और कम आम तौर पर सूक्ष्मजीव, कुछ दवाओं और अन्य परिस्थितियों जैसे स्वप्रतिरक्षित रोगों द्वारा संक्रमण द्वारा होती है। आम लक्षणों में खांसी, सीने का दर्द, बुखार और सांस लेने में कठिनाई शामिल है। नैदानिक उपकरणों में, एक्स-रे और बलगम का कल्चर शामिल है। कुछ प्रकार के निमोनिया की रोकथाम के लिये टीके उपलब्ध हैं। उपचार, अंतर्निहित कारणों पर निर्भर करते हैं। प्रकल्पित बैक्टीरिया जनित निमोनिया का उपचार प्रतिजैविक द्वारा किया जाता है। यदि निमोनिया गंभीर हो तो प्रभावित व्यक्ति को आम तौर पर अस्पताल में भर्ती किया जाता है। वार्षिक रूप से, निमोनिया लगभग 450 मिलियन लोगों को प्रभावित करता है जो कि विश्व की जनसंख्या का सात प्रतिशत है और इसके कारण लगभग 4 मिलियन मृत्यु होती हैं। 19वीं शताब्दी में विलियम ओस्लर द्वारा निमोनिया को “मौत बांटने वाले पुरुषों का मुखिया” कहा गया था, लेकिन 20वीं शताब्दी में एंटीबायोटिक उपचार और टीकों के आने से बचने वाले लोगों की संख्या बेहतर हुई है।बावजूद इसके, विकासशील देशों में, बहुत बुज़ुर्गों, बहुत युवा उम्र के लोगों और जटिल रोगियों में निमोनिया अभी मृत्यु का प्रमुख कारण बना हुआ है।

नैनोप्रौद्योगिकी :-
नैनोतकनीक या नैनोप्रौद्योगिकी, व्यावहारिक विज्ञान के क्षेत्र में, १ से १०० नैनो (अर्थात 10−9 m) स्केल में प्रयुक्त और अध्ययन की जाने वाली सभी तकनीकों और सम्बन्धित विज्ञान का समूह है। नैनोतकनीक में इस सीमा के अन्दर जालसाजी के लिये विस्तृत रूप में अंतर-अनुशासनात्मक क्षेत्रों, जैसे व्यावहारिक भौतिकी, पदार्थ विज्ञान, अर्धचालक भौतिकी, विशाल अणुकणिका रसायन शास्त्र (जो रासायन शास्त्र के क्षेत्र में अणुओं के गैर कोवलेन्त प्रभाव पर केन्द्रित है), स्वयमानुलिपिक मशीनएं और रोबोटिक्स, रसायनिक अभियांत्रिकी, याँत्रिक अभियाँत्रिकी और वैद्युत अभियाँत्रिकी |

नेत्र शोथ :-
नेत्र शोथ जिसे ‘पिंक आई’ या ‘कंजंक्टिवाइटिस’ भी कहा जाता है; आँख की बाहरी पर्त कंजंक्टिवा और पलक के अंदरूनी सतह के संक्रमण को कहते हैं। साधारण भाषा में इसे “आँख आना” भी कहते हैं। यह प्रायः एलर्जी या संक्रमण (सामान्यतः विषाणु किंतु यदा-कदा जीवाणु से) द्वारा होता है। यह संक्रमण अधिकांशतः मानवों में ही होता है, किंतु कहीं कहीं कुत्तों में भी पाया गया है। कंजंक्टिवाइटिस को बोलचाल की भाषा में आँख आना कहते हैं। इसकी वजह से आँखें लाल, सूजन युक्त, चिपचिपी होने के साथ-साथ उसमें बाल जैसी चुभने की समस्याएं हो सकती हैं।

नीम :-
नीम भारतीय मूल का एक पूर्ण पतझड़ वृक्ष है। यह सदियों से समीपवर्ती देशों- पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, म्यानमार (बर्मा), थाईलैंड, इंडोनेशिया, श्रीलंका आदि देशों में पाया जाता रहा है। लेकिन विगत लगभग डेढ़ सौ वर्षों में यह वृक्ष भारतीय उपमहाद्वीप की भौगोलिक सीमा को लांघ कर अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, दक्षिण पूर्व एशिया, दक्षिण एवं मध्य अमरीका तथा दक्षिणी प्रशान्त द्वीपसमूह के अनेक उष्ण और उप-उष्ण कटिबन्धीय देशों में भी पहुँच चुका है। इसका वानस्पतिक नाम ‘Melia azadirachta अथवा Azadiracta Indica’ है।

नील हरित शैवाल :-
नील हरित शैवाल एक जीवाणु फायलम होता है, जो प्रकाश संश्लेषण से ऊर्जा उत्पादन करते हैं। यहां जीवाणु के नीले रंग के कारण इसका नाम सायनो (यूनानी:κυανός अर्थात नीला) से पड़ा है। नील हरित काई वायुमंडलीय नाइट्रोजन यौगिकीकरण कर, धान के फसल को आंशिक मात्रा में की नाइट्रोजन पूर्ति करता है। यह जैविक खाद नत्रजनधारी रासायनिक उर्वरक का सस्ता व सुलभ विकल्प है जो धान के फसल को, न सिर्फ 25-30 किलो ग्राम नत्रजन प्रति हैक्टेयर की पूर्ति करता है, बल्कि उस धान के खेत में नील हरित काई के अवशेष से बने सेन्द्रीय खाद के द्वारा उसकी गुणवत्ता व उर्वरता कायम रखने में मददगार साबित होती है।

पत्रंग :-
पत्रंग या पत्रांग सेसलपिनिया वंश में एक सपुष्पक वनस्पति की जीववैज्ञानिक जाति है। इसका वैज्ञानिक नाम “सेसलपिनिया सपन” (Caesalpinia sappan) है।

परजीविजन्य रोग :-
प्राणिजगत्‌ के अनेक जीवाणु मानव शरीर में प्रविष्ट हो उसमें वास करते हुए उसे हानि पहुँचाते, या रोग उत्पन्न करते हैं। व्यापक अर्थ में विषाणु, जीवाणु, रिकेट्सिया (Rickettsia), स्पाइरोकीट (Spirochaeta), फफूँद और जंतुपरजीवी द्वारा उत्पन्न सभी रोग परजीवीजन्य रोग माने जा सकते हैं, परंतु प्रचलित मान्यता के अनुसार केवल जंतुपरजीवियों द्वारा उत्पन्न विकारों को ही परजीविजन्य रोग (ParasiticDiseases) के अंतर्गत रखते हैं।

पर्यावरण :-
पर्यावरण प्रदूषण – कारखानों द्वारा धुएँ का उत्सर्जन पर्यावरण (Environment) शब्द का निर्माण दो शब्दों से मिल कर हुआ है। “परि” जो हमारे चारों ओर है और “आवरण” जो हमें चारों ओर से घेरे हुए है। पर्यावरण उन सभी भौतिक, रासायनिक एवं जैविक कारकों की समष्टिगत इकाई है जो किसी जीवधारी अथवा पारितंत्रीय आबादी को प्रभावित करते हैं तथा उनके रूप, जीवन और जीविता को तय करते हैं। सामान्य अर्थों में यह हमारे जीवन को प्रभावित करने वाले सभी जैविक और अजैविक तत्वों, तथ्यों, प्रक्रियाओं और घटनाओं के समुच्चय से निर्मित इकाई है। यह हमारे चारों ओर व्याप्त है और हमारे जीवन की प्रत्येक घटना इसी के अन्दर सम्पादित होती है तथा हम मनुष्य अपनी समस्त क्रियाओं से इस पर्यावरण को भी प्रभावित करते हैं। इस प्रकार एक जीवधारी और उसके पर्यावरण के बीच अन्योन्याश्रय संबंध भी होता है। पर्यावरण के जैविक संघटकों में सूक्ष्म जीवाणु से लेकर कीड़े-मकोड़े, सभी जीव-जंतु और पेड़-पौधे आ जाते हैं और इसके साथ ही उनसे जुड़ी सारी जैव क्रियाएँ और प्रक्रियाएँ भी। अजैविक संघटकों में जीवनरहित तत्व और उनसे जुड़ी प्रक्रियाएँ आती हैं, जैसे: चट्टानें, पर्वत, नदी, हवा और जलवायु के तत्व इत्यादि।

पर्यावरणीय जैव-प्रौद्योगिकी :-
जब जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग प्राकृतिक पर्यावरण के अध्ययन के लिए या में किया जाता है, तो उसे पर्यावरणीय जैव-प्रौद्योगिकी कहते हैं। व्यावसायिक उपयोग और इस्तेमाल हेतु जैव प्रौद्योगिकी के प्रयोग को भी पर्यावरणीय जैव-प्रौद्योगिकी समझा जा सकता है। ने पर्यावरणीय जैव-प्रौद्योगिकी की व्याख्या इस प्रकार की है, “दूषित वातावरण (जमीन, हवा, पानी) को ठीक करने और पर्यावरण-अनुकूल प्रक्रियाओं (हरित विनिर्माण प्रौद्योगिकी और स्थायी विकास) के लिए जैविक तंत्रों का विकास, उपयोग तथा विनियमन |

पाचन :-
पाचन वह क्रिया है जिसमें भोजन को यांत्रि‍कीय और रासायनिक रूप से छोटे छोटे घटकों में विभाजित कर दिया जाता है ताकि उन्हें, उदाहरण के लिए, रक्तधारा में अवशोषित किया जा सके |

पादप :-
पादप या उद्भिद (plant) जीवजगत का एक बड़ी श्रेणी है जिसके अधिकांश सदस्य प्रकाश संश्लेषण द्वारा शर्कराजातीय खाद्य बनाने में समर्थ होते हैं। ये गमनागम (locomotion) नहीं कर सकते। वृक्ष, फर्न (Fern), मॉस (mosses) आदि पादप हैं। हरा शैवाल (green algae) भी पादप है जबकि लाल/भूरे सीवीड (seaweeds), कवक (fungi) और जीवाणु (bacteria) पादप के अन्तर्गत नहीं आते। पादपों के सभी प्रजातियों की कुल संख्या की गणना करना कठिन है किन्तु प्रायः माना जाता है कि सन् 2020 में ३ लाख से अधिक प्रजाति के पादप ज्ञात हैं जिनमें से 2.7 लाख से अधिक बीज वाले पादप हैं। पादप जगत में विविध प्रकार के रंग बिरंगे पौधे हैं। कुछ एक को छोड़कर प्रायः सभी पौधे अपना भोजन स्वयं बना लेते हैं। इनके भोजन बनाने की क्रिया को प्रकाश-संश्लेषण कहते हैं। पादपों में सुकेन्द्रिक प्रकार की कोशिका पाई जाती है। पादप जगत इतना विविध है कि इसमें एक कोशिकीय शैवाल से लेकर विशाल बरगद के वृक्ष शामिल हैं। ध्यातव्य है कि जो जीव अपना भोजन खुद बनाते हैं वे पौधे होते हैं, यह जरूरी नहीं है कि उनकी जड़ें हों ही। इसी कारण कुछ बैक्टीरिया भी, जो कि अपना भोजन खुद बनाते हैं, पौधे की श्रेणी में आते हैं। पौधों को स्वपोषित या प्राथमिक उत्पादक भी कहा जाता है। ‘पादपों में भी प्राण है’ यह सबसे पहले जगदीश चन्द्र बसु ने कहा था। पादपों का वैज्ञानिक अध्ययन वनस्पति विज्ञान कहलाता है।

पादप रोगविज्ञान :-
”’चूर्णिल आसिता”’ (Powdery mildew) का रोग एक बायोट्रॉफिक कवक के कारण होता है कृष्ण विगलन (ब्लैक रॉट) रोगजनक का जीवनचक्र पादप रोगविज्ञान या फायटोपैथोलोजी (plant pathology या phytopathology) शब्द की उत्पत्ति ग्रीक के तीन शब्दों जैसे पादप, रोग व ज्ञान से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ है “पादप रोगों का ज्ञान (अध्ययन)”। अत: पादप रोगविज्ञान, कृषि विज्ञान, वनस्पति विज्ञान या जीव विज्ञान की वह शाखा है, जिसके अन्तर्गत रोगों के लक्ष्णों, कारणों, हेतु की, रोगचक्र, रागों से हानि एवं उनके नियंत्रण का अध्ययन किया जाता हैं।

पारस्परण (जीवविज्ञान) :-
जीवविज्ञान में पारस्परण (mutualism) या अंतर्जातीय सहयोग (interspecific cooperation) दो भिन्न जातियों के जीवों के बीच का ऐसा सम्बन्ध होता है जिसमें दोनों जीव एक-दूसरे की क्रियायों से लाभ पाते हैं। उदाहरण के लिए कई प्राणियों के जठरांत्र क्षेत्र मे विशेष प्रकार के बैक्टीरिया का निवास होता है। यह बक्टीरिया प्राणी द्वारा खाये गये भोजन के पाचन में सहायक होते हैं और स्वयं इस भोजन से इनका पोषण होता है।

पाश्चराइजेशन :-
जीवाणु, एक प्रकार के सूक्ष्मजीव पाश्चराइजेशन वह विधि है जिसमें तरल पदार्थों को गरम करके उसके अन्दर के सूक्ष्मजीवों जैसे जीवाणु, कवक, विषाणु आदि को नष्ट किया जाता है। इसका नामकरण फारसी वैज्ञानिक लुई पाश्चर के नाम पर किया गया है। लुई पाश्चर ने पहली बार पाश्चराइजेशन का प्रयोग 20 अप्रैल 1862 को किया था।

प्रतिरूपण :-
समुद्र एनेमोन, प्रतिरूपण की प्रक्रिया में अन्थोप्लयूरा एलेगंटिस्सिमा जीव-विज्ञान में प्रतिरूपण, आनुवांशिक रूप से समान प्राणियों की जनसंख्या उत्पन्न करने की प्रक्रिया है, जो प्रकृति में विभिन्न जीवों, जैसे बैक्टीरिया, कीट या पौधों द्वारा अलैंगिक रूप से प्रजनन करने पर घटित होती है। जैव-प्रौद्योगिकी में, प्रतिरूपण डीएनए खण्डों (आण्विक प्रतिरूपण), कोशिकाओं (सेल क्लोनिंग) या जीवों की प्रतिरूप निर्मित करने की प्रक्रिया को कहा जाता है। यह शब्द किसी उत्पाद, जैसे डिजिटल माध्यम या सॉफ्टवेयर की अनेक प्रतियां निर्मित करने की प्रक्रिया को भी सूचित करता है। क्लोन शब्द κλών से लिया गया है, “तना, शाखा” के लिये एक ग्रीक शब्द, जो उस प्रक्रिया को सूचित करता है, जिसके द्वारा एक टहनी से कोई नया पौधा निर्मित किया जा सकता है। उद्यानिकी में बीसवीं सदी तक clon वर्तनी का प्रयोग किया जाता था; अंतिम e का प्रयोग यह बताने के लिये शुरू हुआ कि यह स्वर एक “संक्षिप्त o” नहीं, वल्कि एक “दीर्घ o” है। चूंकि इस शब्द ने लोकप्रिय शब्दकोश में एक अधिक सामान्य संदर्भ के साथ प्रवेश किया, अतः वर्तनी clone का प्रयोग विशिष्ट रूप से किया जाता है।

प्रतिजैविक :-
किरबी-ब्यूअर डिस्क प्रसार विधि द्वारा स्टेफिलोकुकस एयूरेस एंटीबायोटिक दवाओं की संवेदनशीलता का परीक्षण.एंटीबायोटिक एंटीबायोटिक से बाहर फैलाना-डिस्क युक्त और एस अवरोध के क्षेत्र में जिसके परिणामस्वरूप aureus का विकास बाधित किया जाता है। आम उपयोग में, प्रतिजैविक या एंटीबायोटिक एक पदार्थ या यौगिक है, जो जीवाणु को मार डालता है या उसके विकास को रोकता है। एंटीबायोटिक रोगाणुरोधी यौगिकों का व्यापक समूह होता है, जिसका उपयोग कवक और प्रोटोजोआ सहित सूक्ष्मदर्शी द्वारा देखे जाने वाले जीवाणुओं के कारण हुए संक्रमण के इलाज के लिए होता है। “एंटीबायोटिक” शब्द का प्रयोग 1942 में सेलमैन वाक्समैन द्वारा किसी एक सूक्ष्म जीव द्वारा उत्पन्न किये गये ठोस या तरल पदार्थ के लिए किया गया, जो उच्च तनुकरण में अन्य सूक्ष्मजीवों के विकास के विरोधी होते हैं। इस मूल परिभाषा में प्राकृतिक रूप से प्राप्त होने वाले ठोस या तरल पदार्थ नहीं हैं, जो जीवाणुओं को मारने में सक्षम होते हैं, पर सूक्ष्मजीवों (जैसे गैस्ट्रिक रसऔर हाइड्रोजन पैराक्साइड) द्वारा उत्पन्न नहीं किये जाते और इनमें सल्फोनामाइड जैसे सिंथेटिक जीवाणुरोधी यौगिक भी नहीं होते हैं। कई एंटीबायोटिक्स अपेक्षाकृत छोटे अणु होते हैं, जिनका भार 2000 Da से भी कम होता हैं। औषधीय रसायन विज्ञान की प्रगति के साथ-साथ अब अधिकतर एंटीबायोटिक्ससेमी सिंथेटिकही हैं, जिन्हें प्रकृति में पाये जाने वाले मूल यौगिकों से रासायनिक रूप से संशोधित किया जाता है, जैसा कि बीटालैक्टम (जिसमें पेनसिलियम, सीफालॉसपोरिन औरकारबॉपेनम्स के कवक द्वारा उत्पादितपेनसिलिंस भी शामिल हैं) के मामले में होता है। कुछ एंटीबायोटिक दवाओं का उत्पादन अभी भी अमीनोग्लाइकोसाइडजैसे जीवित जीवों के जरिये होता है और उन्हें अलग-थलग रख्ना जाता है और अन्य पूरी तरह कृत्रिम तरीकों- जैसे सल्फोनामाइड्स,क्वीनोलोंसऔरऑक्साजोलाइडिनोंससे बनाये जाते हैं। उत्पत्ति पर आधारित इस वर्गीकरण- प्राकृतिक, सेमीसिंथेटिक और सिंथेटिक के अतिरिक्त सूक्ष्मजीवों पर उनके प्रभाव के अनुसार एंटीबायोटिक्स को मोटे तौर पर दो समूहों में विभाजित किया जा सकता हैं एक तो वे, जो जीवाणुओं को मारते हैं, उन्हें जीवाणुनाशक एजेंट कहा जाता है और जो बैक्टीरिया के विकास को दुर्बल करते हैं, उन्हें बैक्टीरियोस्टेटिक एजेंट कहा जाता है।

प्रमेह :-
प्रमेह या गोनोरिया एक यौन संचारित बीमारी (एसटीडी) है। गोनोरिया नीसेरिया गानोरिआ नामक जीवाणु के कारण होता है जो महिलाओं तथा पुरुषों के प्रजनन मार्ग के गर्म तथा गीले क्षेत्र में आसानी और बड़ी तेजी से बढ़ती है। इसके जीवाणु मुंह, गला, आंख तथा गुदा में भी बढ़ते हैं। गोनोरिया शिश्न, योनि, मुंह या गुदा के संपर्क से फैल सकता है। गोनोरिया प्रसव के दौरान मां से बच्चे को भी लग सकती है।

प्राच्य :-
प्राच्य या आर्किया (Archaea) एककोशिकीय सूक्ष्मजीवों का अधिजगत निर्मित करते हैं। ये सूक्ष्मजीव अकेन्द्रिक होते हैं, अर्थात् इनके पास कोशिका केन्द्रक नहीं होता हैं। प्राच्य प्रारम्भ में जीवाणु की तरह वगीकृत किये गएँ थे, जिससे उन्हें प्राच्यजीवाणु का नाम मिला (प्राच्यजीवाणु अधिजगत में), पर यह वर्गीकरण अब पुराना हो चुका हैं। प्राच्यीय कोशिकाओं के पास विशिष्ट विशेषताएँ हैं, जो उसे जीवन के अन्य दो अभिजगतों, जीवाणु और सुकेन्द्रिक, से पृथक करता हैं। प्राच्य आगे और कई अभिज्ञात संघों में विभाजित किया जाता हैं। प्राच्य और जीवाणु आम तौर पर आकर और आकृति में समान ही होते हैं, यद्यपि कुछ प्राच्यों का बहुत विचित्र आकार होता हैं, जैसे कि लवणवर्गाकार वॉलस्बी की समतल और वर्गाकार कोशिकाएँ। प्राच्यों को प्रारंभिक रूप से कठोर वातावरण,जैसे हॉट स्प्रिंग्स और नमक झीलों, में रहने वाले चरमपसंदियों के रूप में देखा जाता था, लेकिन वे तब से मिट्टीयों, महासागरों और दलदलों सहित पर्यवासों की एक विस्तृत शृंखला में पाएँ गएँ हैं। प्राच्य महासागरों में विशेष रूप से बहुत संख्या में पाया जाता हैं, और प्लवक में प्राच्य ग्रह पर जीवों के सबसे प्रचुर मात्रा में समूहों में से एक हो सकते हैं।

प्राणी :-
प्राणी या जंतु या जानवर ‘ऐनिमेलिया’ (Animalia) या मेटाज़ोआ (Metazoa) जगत के बहुकोशिकीय और सुकेंद्रिक जीवों का एक मुख्य समूह है। पैदा होने के बाद जैसे-जैसे कोई प्राणी बड़ा होता है उसकी शारीरिक योजना निर्धारित रूप से विकसित होती जाती है, हालांकि कुछ प्राणी जीवन में आगे जाकर कायान्तरण (metamorphosis) की प्रकिया से गुज़रते हैं। अधिकांश जंतु गतिशील होते हैं, अर्थात अपने आप और स्वतंत्र रूप से गति कर सकते हैं। ज्यादातर जंतु परपोषी भी होते हैं, अर्थात वे जीने के लिए दूसरे जंतु पर निर्भर रहते हैं। अधिकतम ज्ञात जंतु संघ 542 करोड़ साल पहले कैम्ब्रियन विस्फोट के दौरान जीवाश्म रिकॉर्ड में समुद्री प्रजातियों के रूप में प्रकट हुए।

प्रांगार चक्र :-
कार्बन चक्र आरेख. काली संख्याएं बिलियन टनों में सूचित करती हैं कि विभिन्न जलाशयों में कितना कार्बन संग्रहीत है (“GtC” से तात्पर्य कार्बन गिगाटन और आंकडे लगभग 2004 के हैं). गहरी नीली संख्याएं सूचित करती हैं कि प्रत्येक वर्ष कितना कार्बन जलाशयों के बीच संचालित होता है। इस चित्र में वर्णित रूप से अवसादों में कार्बोनेट चट्टान और किरोजेन के 70 मिलियन GtC शामिल नहीं हैं। कार्बन चक्र जैव-भूरासायनिक चक्र है जिसके द्वारा कार्बन का जीवमंडल, मृदामंडल, भूमंडल, जलमंडल और पृथ्वी के वायुमंडल के साथ विनिमय होता है। यह पृथ्वी के सबसे महत्वपूर्ण चक्रों में एक है और जीवमंडल तथा उसके समस्त जीवों के साथ कार्बन के पुनर्नवीनीकरण और पुनरुपयोग को अनुमत करता है |

प्रोबायोटिक :-
लैक्टोबैसिलस जीवाणु प्रोबायोटिक जीवाणु है, जो दूध को दही में बदलता है। प्रोबायोटिक एक प्रकार के खाद्य पदार्थ होते हैं, जिसमें जीवित जीवाणु या सूक्ष्मजीव शामिल होते हैं। प्रोबायोटिक विधि रूसी वैज्ञानिक एली मैस्निकोफ ने २०वीं शताब्दी में प्रस्तुत की थी। इसके लिए उन्हें बाद में नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।। हिन्दुस्तान लाइव। १ दिसम्बर २००९ विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रोबायोटिक वे जीवित सूक्ष्मजीव होते हैं जिसका सेवन करने पर मानव शरीर में जरूरी तत्व सुनिश्चित हो जाते हैं।। बिज़नेस भास्कर। २४ मई २००९। डॉ॰ रतन सागर खन्ना ये शरीर में अच्छे जीवाणुओं की संख्या में वृद्धि कर पाचन क्रिया को बेहतर बनाते हैं।। बिज्नेस स्टैण्डर्ड। नेहा भारद्वाज। १८ सितंबर २००८ इस विधि के अनुसार शरीर में दो तरह के जीवाणु होते हैं, एक मित्र और एक शत्रु। भोजन के द्वारा यदि मित्र जीवाणुओं को भीतर लें तो वे धीरे-धीरे शरीर में उपलब्ध शत्रु जीवाणुओं को नष्ट करने में कारगर सिद्ध होते हैं। मित्र जीवाणु प्राकृतिक स्रोतों और भोजन से प्राप्त होते हैं, जैसे दूध, दही और कुछ पौंधों से भी मिलते हैं।

पृथ्वी का इतिहास :-
पृथ्वी के इतिहास के युगों की सापेक्ष लंबाइयां प्रदर्शित करने वाले, भूगर्भीय घड़ी नामक एक चित्र में डाला गया भूवैज्ञानिक समय. पृथ्वी का इतिहास 4.6 बिलियन वर्ष पूर्व पृथ्वी ग्रह के निर्माण से लेकर आज तक के इसके विकास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं और बुनियादी चरणों का वर्णन करता है। प्राकृतिक विज्ञान की लगभग सभी शाखाओं ने पृथ्वी के इतिहास की प्रमुख घटनाओं को स्पष्ट करने में अपना योगदान दिया है। पृथ्वी की आयु ब्रह्माण्ड की आयु की लगभग एक-तिहाई है। उस काल-खण्ड के दौरान व्यापक भूगर्भीय तथा जैविक परिवर्तन हुए हैं।

पैकिसेरियस प्रिंगलेइ :-
पैकिसेरियस प्रिंगलेइ (Pachycereus pringlei), जिसे मेक्सिकी बड़ा कार्दन (Mexican giant cardon) या हाथी कैक्टस (elephant cactus) भी कहा जाता है, कैक्टस की एक जीववैज्ञानिक जाति है को मूल रूप से पश्चिमोत्तरी मेक्सिको में बाहा कैलिफ़ोर्निया, बाहा कैलिफ़ोर्निया सुर और सोनोरा राज्यों में पाई जाती है। इन क्षेत्रों के स्थानीय सेरी लोग (जो यहाँ की आदिवासी जनजाति है) इस कैक्टस के फल खाते हैं।

पेचिश :-
पेचिश (Dysentery) या प्रवाहिका, पाचन तंत्र का रोग है जिसमें गम्भीर अतिसार (डायरिया) की शिकायत होती है और मल में रक्त एवं श्लेष्मा (mucus) आता है। यदि इसकी चिकित्सा नहीं की गयी तो यह जानलेवा भी हो सकता है।

पीतज्वर :-
पीतज्वर या ‘यलो फीवर’ (Yellow fever) एक संक्रामक तथा तीव्र रोग हैं, जो सहसा आरंभ होता है। इसमें ज्वर, वमन, मंद नाड़ी, मूत्र में ऐल्वुमेन की उपस्थिति, रक्तस्राव तथा पीलिया के लक्षण होते हैं। इस रोग का कारक एक सूक्ष्म विषाणु होता है, जिसका संवहन ईडीस ईजिप्टिआई (स्टीगोमिया फेसियाटा) जाति के मच्छरों द्वारा होता है। यह रोग कर्क तथा मकर रेखाओं के बीच स्थित अफ्रीका तथा अमरीका के भूभागों में अधिक होता है।

General Science Ke Question Answer

आज हम इस पोस्ट के माध्यम से आपको पादप रोग कौन फैलाते हैं की संपूर्ण जानकारी इस पोस्ट के माध्यम से आपको मिल जाएगी अगर आपको यह पोस्ट अच्छी लगे तो आप इस पोस्ट को जरूर अपने दोस्तों के साथ शेयर करना एव पादप रोग कौन फैलाते हैं संबंधी किसी भी प्रकार की जानकारी पाने के लिए आप कमेंट करके जरूर बतावें,

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